उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्या है गेस्ट हाउस कांड, जानिए विस्तार से

मायावती तब और अब , गेस्ट हाउस कांड

इन्फोपत्रिका, नई दिल्ली.
इन दिनों राजनीतिक गेस्ट हाउस कांड काफी चर्चा में है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में रह-रहकर इस कांड का जिन्न बोतल से बाहर आ ही जाता है. आजकल भारतीय जनता पार्टी के नेता इस जिन्न को आज़ाद करने की भरसक कोशिश में लगे हुए हैं. ये एक ऐसा कांड है जो मायावती (बसपा) और मुलायम सिंह यादव (सपा) से जुड़ा हुआ है. क्या आप जानते हैं कि ये कांड था क्या? आखिर उस दिन हुआ क्या था?

अजय बोस की किताब देती है पूरी जानकारी

जाने-माने लेखक और पत्रकार अजय बोस ने मायावती और उनसे जुड़ी राजनीति को बहुत बारीकी से देखा और एक किताब लिखी, जिसका नाम है “बहन जी”. इस किताब में उन्होंने मायावती से जुड़ी बहुत सारी ऐसी बातों का जिक्र किया है, जिसे आमजन नहीं जानते. बहन जी अर्थात मायावती को अच्छे से समझने के लिए इस किताब को पढ़ना जरूरी है. अजय बोस की किताब में 1995 के लखनऊ गेस्ट हाउस कांड के बारे में विस्तार से लिखा गया है.

सपा-बसपा गठबंधन बना और टूटा

इस घटनाक्रम को पूरा समझाने के लिए शुरू से कहानी बतानी होगी. सन 1992 में मुलायम सिंह यादव ने अपनी पार्टी बनाई. तब तक भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश पर अच्छी पकड़ थी. 1993 के यूपी के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का गठबंधन हुआ. बसपा 164 सीटों पर तो सपा 256 सीटों पर चुनाव लड़ी. सपा ने 109 सीटें जीतीं और बसपा ने 67 सीटें हासिल कीं.

Mayawati with sword

1993 में चुनाव हुआ और सपा-बसपा गठबंधन बहुमत में आ गया. मुलायम सिंह यादव राज्य के मुख्यमंत्री बनाए गए. ये गठबंधन जैसे-तैसे दो साल तक चला और 2 जून 1995 में मायावती की पार्टी बसपा ने समर्थन वापसी की घोषणा करते हुए सरकार से अपना हाथ खींच लिया. मुलायम सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई. सरकार बचाने के लिए काफी जोड़-तोड़ किया गया, मगर अंत में सपा के नजरिये से कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला.

इस सबसे नाराज सपा समर्थक कार्यकर्ता और विधायक लखनऊ के मीराबाई मार्ग पहुंचे जहां राज्य का सरकारी गेस्ट हाउस स्थित था. यहां रूम नंबर एक में मायावती ठहरी हुई थीं.

मायावती की इज्जत पर डाला गया था हाथ

जब नाराज सपा विधायक और समर्थक गेस्टहाउस पहुंचे तो अभद्र व्यवहार किया. हालांकि किताब में इस बात का जिक्र नहीं मिलता, मगर राजनीति से जुड़े पुराने लोग इस बात को सच मानते हैं कि सपा समर्थकों ने बसपा सुप्रीमो मायावती के कपड़े फाड़े और उनकी इज्जत को तार-तार करने की कोशिश की. बताया जाता है कि कुछ असामाजिक तत्वों ने मायावती को कमेर में बंद करके मारा पीटा भी.

बीजेपी विधायक ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने बचाया

कहा ये भी जाता है कि RSS कार्यकर्ता और बीजेपी विधायक ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने मायावती को बचाया. चूंकि ब्रह्मदत्त द्विवेदी को लाठी चलाना अच्छे से आता था तो एक लाठी के सहारे वे मायावती पर हमला करने वालों से भिड़ गए और उन्हें बचाया. इस कांड के बाद मायावती ने ब्रह्मदत्त द्विवेदी को अपना भाई मान लिया और जब तक वे जीवित रहे, उनकी अहसानमंद रहीं. मायावती ने बीजेपी के खिलाफ जमकर प्रचार किया, मगर वे ब्रह्मदत्त द्विवेदी के खिलाफ फर्रुखाबाद से बसपा का कोई उम्मीदवार नहीं उतारती थीं. बाद में ब्रह्मदत्त की गोली मारकर हत्या कर दी गई तो मायावती ने उनकी पत्नी के लिए प्रचार किया और वोट मांगे.

बीजेपी की राजनीतिक चाल!

कुछ लोग तो इसे भारतीय जनता पार्टी की चाल तक बताते हैं. कहा जाता है कि 1992 में जब बाबरी मस्जिद गिराई गई तो बीजेपी हिन्दू ध्रुवीकरण के सहारे बड़ी पार्टी बनने की तरफ बढ़ रही थी. बीजेपी को रोकने के लिए ही सपा और बसपा एक साथ आए. बीजेपी के दिल्ली में बैठे राजनेताओं को ये चिंता सताने लगी कि ये सपा-बसपा गठबंधन अगर सत्ता में रहा तो उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

कहा जाता है कि बीजेपी ने मायावती को अपने समर्थन से मुख्यमंत्री बनाने का लालच दिया. उनकी नजदीकियां बीजेपी नेताओं से बढ़ गईं. दोनों दलों के बीच कई बैठकें हुईं और बसपा ने सपा से अपना नाता तोड़ लिया. बाद में भारतीय जनता पार्टी ने मायावती को अपना समर्थन देकर मुख्यमंत्री बनवाया.

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