जीरो बजट खेती : जीवामृत बेहतर या फिर डी कंपोजर अच्‍छा, जानिए

Jivamrut V/s D composer

इन्‍फोपत्रिका खेती डेस्‍क


हरियाणा कृषि विभाग में करीब 30 साल काम करने के बाद डाक्‍टर रामकुमार खर्ब अब जीरो बजट खेती को बढावा दे रहे हैं। डाक्‍टर खर्ब का कहना है कि जीरो बजट खेती तभी संभव है जब हम इस खेती से जुडे सभी पहलुओं से अच्‍छी तरह वाकिफ हों। अगर हमने किसी एक भी पहलू की उपेक्षा की तो हमारा लक्ष्‍य पूरा नहीं होगा।

जीवामृत को जाने बिना जीरो बजट खेती संभव नहीं

डाक्‍टर खर्ब का कहना है‍ कि जीरो बजट खेती करने के इच्‍छुक किसान को जीवामृत को अच्‍छे से समझना होगा। जीवामृत जीरो बजट खेती का आधार है। यही वो तत्‍व है जो खेती के लागत मूल्‍य को शून्‍य करता है। डाक्‍टर खर्ब के अनुसार जीवामृत कोई खाद नहीं है। जीवामृत मृदा की उपजाउ शक्ति बढाने वाले बैक्टिरिया हैं। इसकी सहायता से धरती में बैक्टिरिया की संख्‍या को बढाया जाता है। ये बैक्टिरिया पौधे की जडों के साथ मिलकर आवश्‍यक पोषक तत्‍वों की पूर्ति करते हैं। इससे बिना कोई खर्च किए किसान को आवश्‍यक पोषक तत्‍व मिल जाते हैं और खर्चा बच जाता है।


इस वीडियो में डॉक्‍टर खर्ब बता रहे हैं जीवामृत और डी कंपोजर के बारे में, देखिए….



वीडियो साभार : Technical Farming

डी कंपोजर से जीरो बजट खेती संभव नहीं है, Jivamrut V/s D composer

डी कंपोजर से खाद और स्‍प्रे बनाई जा सकती है। जैविक खाद बनाने में इसका प्रयोग किया जाता है। लेकिन जीरो बजट खेती के लक्ष्‍य को इससे प्राप्‍त नहीं किया जा सकता। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि अगर डी कंपोजर की सहायता से जैविक खाद किसान बनाएगा तो इनपुट कॉस्‍ट यानि खेती पर लागत बढ जाएगी। जबकि जीरो बजट खेती का लक्ष्‍य पैसा लगाए पैदावार लेना है।

दोनों का साथ अच्‍छा

डाक्‍टर खर्ब का कहना है कि जीरो बजट खेती के लिए जीवामृत सबसे जरूरी है। इसमें डी कंपोजर भी सहायता करेगा। लेकिन अगर कोई यह सोचता है कि जीवामृत के बिना वह डी कंपोजर से ही अपना लक्ष्‍य हासिल कर लेगा, तो उसकी सोच गलत है।

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