डायबिटीज से बचना है तो धूल-मिट्टी का भी करें सामना

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इन्‍फोपत्रिका हेल्‍थ डेस्‍क


अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्‍चा डाइबिटीज की चपेट में न आए तो उसे अत्‍यधिक साफ-सुथरे वातावरण में रखने की कोशिश न करें। अत्‍यधिक साफ-सफाई टाइप वन डाइबिटीज को बुलावा देती है। यह बात सामने आई है हाल ही में हुए एक शोध में। शोधकर्ताओं ने फिनलैंड में बच्‍चों में बढ रही डाइबिटीज की बीमारी का अध्‍ययन किया तो पाया कि यहां के बच्‍चे उन देशों के बच्‍चों के मुकाबले डाइबिटीज का शिकार ज्‍यादा हो रहे हैं जहां का वातावरण फिनलैंड के मुकाबले ज्‍यादा प्रदूषित है। गौरतलब है कि फिनलैंड दुनिया का सबसे साफ-सुथरा देश है। वहां के लोग सफाई को लेकर बहुत जागरूक है। वहां पर एक लाख बच्‍चों में से 58 बच्‍चे टाइप वन डाइबिटीज का शिकार है। यह दर अन्‍य विकसित देशों के मुकाबले बहुत ज्‍यादा है।


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Image : Childhealth

खतरनाक है बैक्टिरिया रहित वातावरण में रहना

शोधकर्ताओं का कहना है कि साफ-सुथरे वातावरण में भी डायबिटीज होने का खतरा रहता है। ब्रिटिश के शोधकर्ताओं के अनुसार बचपन में बैक्टीरिया और वायरस रहित वातावरण आगे जाकर हाई ब्लड प्रेशर और उससे संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है। अध्ययन के मुताबिक बचपन के दौरान शरीर में ऐसे ‘ह्यूमन फ्रेंडली’ बैक्टीरिया विकसित होते हैं जो टाइप 1 डायबिटीज से लड़ने में मददगार होते हैं। इनके चलते प्रतिरक्षा तंत्र कोशिकाओं को इंसुलिन बनाने के लिए प्रेरित करता है।


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ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी ने सफाई और डाइबिटीज के मध्‍य संबंध जानने को शोध किया। शोधकर्ता सुजेन वांग के अनुसार आंतों में पाए जाने वाले ह्यूमन फ्रेंडली बैक्टीरिया और प्रतिरक्षा तंत्र के बीच गहरा संबंध है। अब हम इस बात की खोज में लगे हैं कि यह बैक्टीरिया किस तरह से प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय कर टाइप 1 डायबिटीज को रोकने में सफल होता है।

अत्‍यधिक स्‍वच्‍छता मतलब कमजोर इम्‍यून सिस्‍टम

यूनिवर्सिटी ऑफ हेलेंस्‍की के बाल रोग विभाग के प्रोफेसर माइकेल निप पिछले तीस सालों से डाइबिटीज पर शोध कर रहे हैं। प्रोफेसर निप का कहना है कि अत्‍यधिक स्‍वच्‍छता हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करती है। यह न केवल टाइप वन डाइबिटीज का खतरा बढाती है बल्कि आगे बच्‍चों में अस्‍थमा, एलर्जी और अन्‍य ऑटोइम्‍यून बीमारियां पैदा होने का खतरा बढाती है।


प्रोफेसर निप का कहना है कि जिस तरह बीमारी को बढाने वाले कुछ माइक्रोब्‍स होते हैं, उसी तरह कुछ बैक्‍टेरियल या वायरल इन्‍फेक्‍शन ऐसे होते हैं जो अगर बच्‍चे में बचपन में ही पैदा हो जाएं तो ये आगे चलकर बच्‍चे को टाइप वन डाइबिटीज से बचा सकते हैं। इन वायरल या बैक्‍टेरियल इंन्‍फेक्‍शन को पैदा होने के लिए थोडा दूषित वातावरण या माहौल चाहिए होता है।

क्‍या है टाइप वन डाइबिटीज

दुनिया में करीब 37 मिलियन लोग टाइप वन डाइबिटीज से पीडित है। यह एक ऑटोइम्‍यून बीमारी है जिसमें हमारा शरीर पर्याप्‍त मात्रा में इन्‍सुलिन नामक हार्मोन पैदा नहीं करता। इन्‍सुलिन ही वह हार्मोन है जो शुगर को शरीर में तोडता है। टाइप वन डाइबिटीज आंखों को नुकसान पहुंचाता है और इससे किडनी भी खराब हो सकती है। दिल का दौरा पडने की संभावना भी यह बढाता है।

स्‍वच्‍छ रहें पर स्‍वच्‍छता को फोबिया न बनाएं

प्रोफेसर निप ने अमेरिकी समाचार-पत्र वाशिंगटन पोस्‍ट को बताया कि बीमारियों से बचने के लिए सफाई बहुत जरूरी है। लेकिन अगर हम अत्‍यधिक स्‍वच्‍छता को अपनाएंगे तो मुश्किल में घिर जाएंगे। अगर हमारे घर में धूल का एक भी कण नहीं होगा, हम अत्‍यंत हाइजिन खाना खाएंगे और धूल-मिट्टी या प्रदूषण की चपेट में कभी नहीं आएंगे, तो हमारे शरीर में रोगों से लडने की क्षमता पैदा नहीं होगी। इन सब के थोडा थोडा चपेट में आना बहुत जरूरी है।

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