16 साल से एक बार भी नहीं जोता खेत, हो रही है भरपूर फसल

Conventional farming

रविन्द्र कुमार सैनी/ इन्फोपत्रिका


अभी तक आपने खेती के बहुत से तरीकों के बारे में पढ़ा या सुना होगा। जिसमें आपको बताया गया होगा कि कैसे खेत में निराई, गुड़ाई, जोतना, मिट्टी को समतल बनाना, पानी लगाना आदि की क्रियाएं करते आए हैं। और अमूमन हर कहीं खेती होती भी ऐसे ही है। लेकिन कुछ किसान लीक से हटकर भी खेती करते हैं। उनका नाम तो होता ही है साथ में निकलकर आती है कुछ नई जानकारी व तकनीकें। जिन्हें अपनाकर अन्य किसान खेती को और उन्नत कर सकते हैं।


ऐसे ही एक किसान है जिन्होंने अपनी पेट्रोल पंप मैनेजर की खेती छोड़कर लगभग 17 साल पहले खेती की शुरूआत की। मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले के गांव भारद के सतीश दूबे ने खेती में छोटी सी शुरूआत की। खुद की जमीन ढाई एकड़ में खेती के अलावा 30-32 एकड़ किराये यानि बंटाई पर लेकर कर रहे हैं।


Conventional farming

क्या खास है इस खेती में

इस पूरी खेती में खास बात ये है कि सतीश अपने खेत को कभी भी जोतते नहीं हैं। जबलपुर का जो एरिया है वो काली और चिकनी मिट्टी का है। यह मिट्टी सुखने पर और कड़ी हो जाती है और यह जगह-जगह से फटने लग जाती है। लेकिन सतीश इसमें खेत जोतने की बजाय सीधा ही बुआई कर देते हैं। उनको यह सलाह दी जबलपुर के डायरेक्टरेट ऑफ़ वीड रिसर्च के वैज्ञानिकों ने। परंपरागत खेती कहे जाने वाली इस तकनीक पर अजित राम शर्मा पिछले 16 सालों से काम कर रहे हैं। जिन्होंने 16 साल तक देहरादून और दिल्ली के इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट में काम किया है। अब संस्था का यह फ्लैगशिप प्रोग्राम बन चुका है।


शर्मा का मानना है कि मिट्टी में उर्वरक और रासायनिक, यूरिया आदि से इसकी ऊपजाऊपन पर प्रभाव पड़ता है। इनके प्रयोग से पैदावार बढ़ती है लेकिन मिट्टी की क्षमता भी खत्म होती चली जाती है। संरक्षित खेती के तहत जंगल की जमीन को कोई भी नहीं जोतता। जोतने से मिट्टी सूख जाती है। कई फ़सलों में उनकी जड़ों को ज़मीन से पोषक तत्व लेने में रोक लगाती है और इससे मिट्टी के माइक्रोबियल गुणों पर भी असर पड़ता है, इसलिए बोरलॉग इंस्टीट्यूट ऑफ़ साउथ एशिया भारत में कुछ बदलाव के साथ संरक्षित खेती की सलाह देती है। इस इंस्टीट्यूट का नाम नॉरमन बोरलॉग के नाम पर रखा गया है जिन्हें हरित क्रांति का जनक कहा जाता है।

कहां-कहां है इस इंस्टीट्यूट की शाखाएं

इस इंस्टीट्यूट की शाखाएं पंजाब के लुधियाना, बिहार के समस्तीपुर और मध्यप्रदेश के जबलपुर में हैं। यह इंस्टीट्यूट उत्तरी-पश्चिमी भारत में जहां बाढ़ के पानी से सिंचाई होती है, बुआई से पहले लेज़र लेवलिंग की सलाह देता है ताकि थोड़े से पानी से बड़े खेत का काम चल जाए। मगर मध्य भारत में बड़े पैमाने पर सिंचाई के साधनों का इस्तेमाल होता है, ज़मीन की सतह लहरदार है इसलिए वहां लेज़र लेवलिंग की ज़रूरत नहीं पड़ती।

इस खेती के हैं तीन नियम

1. खेत की बिल्कुल भी जुताई न करें या बहुत कम जुताई करें।
2. पिछली फ़सल के डंठल खेत में ही छोड़ दें ताकि वह खेत की नमी बरकरार रखें। खेत में खरपतवार को दबाकर रखें और मिट्टी के जैविक गुण में इज़ाफ़ा करें।
3. मिट्टी में नाइट्रोज़न की मात्रा बढ़ाने के लिए फल लगने वाले फ़सलों की खेती की जाए।

हरित क्रांति के दौर रहा लापरवाही का

हरित क्रांति के दौरान खाद्यान की समस्या से निपटने के लिए हर तरीके से पैदावार को बढ़ाने की कोशिश की गई। जिसके कारण मिट्टी की गुणवत्ता में कमी आती गई। उस वक़्त सारा ध्यान खाद्य सुरक्षा को लेकर था। लेकिन अब हालात उलट है इसलिए मिट्टी की गुणवत्ता को फिर से बढ़ाने के लिए भारत में बड़े पैमाने पर संरक्षित खेती अपनाने की ज़रूरत है।

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